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गोवर्धन असरानी: ‘अंग्रेजों के ज़माने के जेलर’ से लेकर कॉमेडी के किंग तक का सफर

( विशेष संवाददाता ) – मुंबई। हिंदी सिनेमा के दिग्गज हास्य अभिनेता गोवर्धन असरानी, जिन्हें दर्शक आज भी ‘शोले’ के ‘अंग्रेजों के ज़माने के जेलर’ के रूप में याद करते हैं, ने अपने पांच दशक से अधिक के शानदार करियर में 350 से ज़्यादा फिल्मों में काम कर भारतीय सिनेमा पर एक अमिट छाप छोड़ी है। उनका जीवन संघर्ष, समर्पण और हास्य प्रतिभा का एक अद्भुत संगम था, जिसने उन्हें हर पीढ़ी के दर्शकों का प्रिय बना दिया।

जयपुर से मुंबई का संघर्षपूर्ण सफर
गोवर्धन असरानी का जन्म 1 जनवरी 1941 को राजस्थान के गुलाबी नगर जयपुर में एक साधारण सिंधी परिवार में हुआ था। पिता का कालीन का व्यवसाय था, लेकिन युवा असरानी का मन बचपन से ही अभिनय में रमा हुआ था। उन्होंने अपनी पढ़ाई का खर्च उठाने के लिए जयपुर के ऑल इंडिया रेडियो (आकाशवाणी) में वॉयस आर्टिस्ट के तौर पर काम किया।

अभिनय के जुनून ने उन्हें मुंबई खींच लिया, लेकिन प्रशिक्षित अभिनेता होने के बावजूद शुरुआती दौर में उन्हें काम के लिए भटकना पड़ा। संघर्ष के इस दौर में, मशहूर फिल्म निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी की सलाह पर उन्होंने पुणे के प्रतिष्ठित फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (FTII) में दाखिला लिया और एक्टिंग का विधिवत प्रशिक्षण लिया। FTII में वह एक छात्र होने के साथ-साथ बाद में प्रोफेसर भी बने, जहाँ उन्होंने जया भादुड़ी जैसी कलाकारों को पढ़ाया।

इंदिरा गांधी की मदद और करियर का उदय
FTII से डिग्री लेने के बावजूद, जब असरानी को फिल्म उद्योग में काम नहीं मिला, तो उन्होंने एक बार तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्री इंदिरा गांधी से शिकायत की। उनकी पहल के बाद ही, असरानी और अन्य प्रशिक्षित कलाकारों को निर्माताओं से मौका मिलना शुरू हुआ। 1971 में ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्म ‘गुड्डी’ में एक महत्वाकांक्षी अभिनेता के उनके किरदार ने उन्हें पहचान दिलाई। इसके बाद, उन्होंने ‘बावर्ची’, ‘नमक हराम’, ‘कोशिश’ और ‘अभिमान’ जैसी कई गंभीर और हास्य फिल्मों में सशक्त भूमिकाएँ निभाईं।

शोले’ का यादगार जेलर

साल 1975 में आई ब्लॉकबस्टर फिल्म ‘शोले’ ने असरानी के करियर को एक नई ऊँचाई दी। जेलर का उनका किरदार और उनका संवाद “हम अंग्रेजों के ज़माने के जेलर हैं!” आज भी हिंदी सिनेमा के सबसे प्रसिद्ध और यादगार कॉमिक संवादों में से एक है। इस एक रोल ने उन्हें घर-घर में लोकप्रिय बना दिया।

इसके अलावा, उन्होंने ‘छोटी सी बात’, ‘चुपके चुपके’, और बाद में ‘हेरा फेरी’, ‘भूल भुलैया’, ‘धमाल’ और ‘वेलकम’ जैसी फिल्मों में भी अपने अनूठे हास्य से दर्शकों को गुदगुदाया। अभिनेता होने के अलावा, असरानी ने कुछ हिंदी और गुजराती फिल्मों का निर्देशन भी किया। गोवर्धन असरानी भले ही आज हमारे बीच न हों, लेकिन उनकी अनूठी कॉमेडी टाइमिंग और निभाए गए यादगार किरदार हमेशा भारतीय सिनेमा प्रेमियों के चेहरों पर मुस्कान लाते रहेंगे।

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